भारत की वह महिला, जिन्हें कहा जाता है ‘दक्षिण भारत की मीरा’
आपने उत्तर भारत में श्रीकृष्ण की परम भक्त मीरा के बारे में सुना या पढ़ा ही होगा। हालांकि, इसी प्रकार दक्षिण भारत में भी एक ऐसी महिला रही हैं, जिन्हें ‘दक्षिण भारत की मीरा’ कहा जाता है। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे।
उत्तर भारत में मीराबाई को भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्तों में गिना जाता है। उन्होंने श्रीकृष्ण को अपना पति मानकर उनकी भक्ति में अपना पूरी जीवन समर्पित कर दिया था। दक्षिण भारत में भी एक ऐसी महिला रही हैं, जिन्होंने भगवान रंगनाथ यानि कि भगवान विष्णु के अवतार के प्रति इस प्रकार सेवा भाव दिखाया कि उन्हें ‘दक्षिण भारत की मीरा’ कहा जाने लगा। इस लेख में हम उनके बारे में विस्तार से जानेंगे।
किसे कहा जाता है ‘दक्षिण भारत की मीरा’
अब हम यह जान लेते हैं कि ‘दक्षिण भारत की मीरा’ किसे कहा जाता है, तो आपको बता दें कि यह उपनाम देवी आंडाल को दिया गया था। आंडाल, दक्षिण भारत के प्रसिद्ध 'अलवार' संतों में एकमात्र महिला संत थीं। भारत की वैष्णव परंपरा में उनका बहुत सम्मान है। अब हम उनके जीवन और भक्ति के बारे में जानेंगे। आपको बता दें कि इस विषय पर विभिन्न परीक्षाओं सवाल पूछे जा चुके हैं।
कब और कहां हुआ था जन्म
महिला संत आंडाल का जन्म 8वीं शताब्दी (कुछ मान्यताओं के अनुसार छठी शताब्दी) के दौरान तमिलनाडु के श्रीविल्लीपुत्तुर में हुआ था। उनके जन्म के बारे में कहानी है कि अलवार संतों में से एक, विष्णुचित्त को वह एक तुलसी के पौधे के नीचे पड़ी हुई मिली थीं। उन्होंने उनका नाम 'कोधई' रखा, जिसका अर्थ सुंदर माला होता है। उन्होंने कोधई को अपनी बेटी की तरह पाला।
आंडाल को 'दक्षिण की मीरा' क्यों कहा जाता है?
कोधई बचपन से ही भगवान विष्णु की कहानियां सुनते हुए बढ़ी हुई थीं। जब वह युवा हुईं, तो उन्होंने किसी और से विवाह करने के बजाय भगवान विष्णु को ही अपना पति माना और उनकी भक्ति बढ़ती गई। कुछ इसी तरह की भक्ति राजस्थान में मीराबाई ने श्रीकृष्ण के लिए दिखाई थी।
क्या है आंडाल का अर्थ
कोधई के पिता भगवान विष्णु के लिए माला बनाते थे, लेकिन कोधई उसे खुद पहनकर उतार देती थी। इस घटना को उनके पिता द्वारा देख लिया गया, जिसके बाद दूसरी माला बनाई गई। लोककथाओं के मुताबिक, यह माला भगवान विष्णु को स्वीकार नहीं हुई। इस घटना के बाद कोधई का नाम 'आंडाल' पड़ा, जिसका तमिल में अर्थ होता है "वह जिसने भगवान पर शासन किया हो"।
आंडाल का साहित्यिक योगदान
आंडाल ने तिरुप्पावई की रचना की है, जिसमें 30 पद हैं। आज इसे दक्षिण भारत के घरों में पढ़ा जाता है। इसके अतिरिक्त, नाचियार तिरुमोली में 143 पद हैं, जिसमें आंडाल ने भगवान विष्णु के प्रति अपनी भक्ति के बारे में लिखा है।
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