‘महाराष्ट्र का सुकरात’ किसे कहा जाता है, यहां जानें

Last Updated: Jun 24, 2026, 13:44 IST

आपने सुकरात के बारे में पढ़ा या फिर सुना ही होगा, जो कि अपनी तार्किक सोच और विचारों के लिए जाने जाते थे। ठीक इसी प्रकार, भारत में एक व्यक्ति ऐसे भी हैं, जिन्हें ‘महाराष्ट्र का सुकरात’ कहा जाता है। 

महाराष्ट्र का सुकरात
महाराष्ट्र का सुकरात

दुनिया में जब भी तार्किक सोच और विचारों की बात होती है, तो प्राचीन यूनान के सुकरात का नाम याद किया जाता है। हालांकि, भारत में भी एक व्यक्ति ऐसे रहे हैं, जिन्हें ‘महाराष्ट्र का सुकरात’ कहा जाता है। वह समाज सुधारक के साथ-साथ अर्थशास्त्री और जज के रूप में भी अपने पहचान रखते हैं। अक्सर विभिन्न परीक्षाओं में उनसे जुड़े सवाल पूछे जाते हैं। इस लेख में हम उनके बारे में विस्तार से जानेंगे।

किसे कहा जाता है ‘महाराष्ट्र का सुकरात’ 

सबसे पहले हम यह जान लेते हैं कि भारत में महादेव गोविंद रानाडे को ‘महाराष्ट्र का सुकरात’ कहा जाता है। जस्टिस रानाडे ने महाराष्ट्र में शिक्षा और सुधारों को लेकर महत्त्वपूर्ण काम किया था।

जस्टिस रानाडे द्वारा किये गए सुधार

एमजी रानाडे ने समाज में फैली बाल विवाह और छुआछूत जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ आवाज उठाई थी। उन्होंने महिला शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह का भी समर्थन किया था। 

प्रार्थना सामाज

भारत में प्रार्थना समाज की स्थापना 1867 में मुंबई में डॉ. आत्माराम पांडुरंग द्वारा की गई थी। हालांकि, बाद में इसमें रानाडे शामिल हुए और इसे महाराष्ट्र में सामाजिक सुधार का आधार बनाया।

पुणे सार्वजनिक सभा की स्थापना की

जस्टिस रानाडे ने 1870 में पुणे सार्वजनिक सभा की स्थापना में योगदान दिया था। यह सभा जनता की समस्याओं को सरकार के सामने उठाती थी।

गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक गुरु

एमजी रानाडे को गोपाल कृष्ण गोखले का राजनीतिक गुरु माना जाता है। आपको बता दें कि गोखले आगे चलकर महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु बने थे। ऐसे में रानाडे के विचारों का गांधी पर भी असर पड़ा।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से क्या रहा जुड़ाव

एमजी रानाडे 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना करने वाले सदस्यों में शामिल थे। उन्होंने सामाजिक सुधारों के तहत भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन की भी शुरुआत की थी, जिसका सेशन हर साल कांग्रेस सेशन के ठीक बाद उसी मंच पर होता था।

बांबे हाई कोर्ट के न्यायाधीश थे रानाडे

एमजी रानाडे को कानून की गहरी समझ थी। वह 1893 में बांबे हाई कोर्ट के न्यायाधीश बने थे। उस दौर में बहुत ही कम भारतीय ऐसे पदों पर पहुंच पाते थे। कई बार परीक्षाओं में उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक के बारे में भी पूछ लिया जाता है। ऐसे में इसका जवाब ‘राइज ऑफ द मराठा पावर’ है। यह रानाडे द्वारा लिखी गई एक प्रसिद्ध पुस्तक है।

Kishan Kumar
Kishan Kumar

Senior Executive - Editorial

A seasoned journalist and Multimedia Producer with over 8 years of experience in print and digital media, Kishan specializes in turning complex topics into clear, compelling narratives. Currently working as a Senior Content Writer in the GK section at Jagran Josh, he brings deep subject expertise in History, Polity, and Geography, writing on national and international affairs from a general knowledge perspective. He can be reached at Kishan.kumar@jagrannewmedia.com.

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First Published: Jun 24, 2026, 13:44 IST

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