भारत को विविधताओं का देश कहा जाता है। यहां प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में अलग-अलग शहर मौजूद हैं, जिनकी अपनी-अपनी विशेषताएं हैं। इस कड़ी में भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित वाराणसी शहर को ‘भारत की आध्यात्मिक राजधानी’ भी कहा जाता है। यह शहर अतीत, संस्कृति, विरासत, धर्म और कर्म का शहर है, जो कि वर्षों से भारत की पुरातन संस्कृति को दर्शाता आ रहा है। इस लेख में हम इससे जुड़े अन्य तथ्यों पर गौर करेंगे।
क्यों कहा जाता है आध्यात्मिक राजधानी
वाराणसी यानि कि काशी को आध्यात्मिक राजधानी कहने के पीछे इसका हजारों साल पुराना जीवंत इतिहास और धार्मिक विश्वास है। आइए इसके मुख्य कारण को समझते हैंः
सबसे पुराना जीवित शहर
वाराणसी को लेकर मार्क ट्वेन ने कहा था कि वाराणसी का इतिहास, पंरपराओं से भी पुराना है। यह दुनिया के उन शहरों में शामिल है, जहां हजारों सालों से मानव सभ्यता और धार्मिक गतिविधियों का मिश्रण देखने को मिलता है।
भगवान शिव की नगरी के रूप में पहचान
वाराणसी में भगवान शिव का प्रसिद्ध मंंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जो कि हिंदू धर्म में विशेष स्थान रखता है।
मोक्षनगरी के रूप में पहचान
आध्यात्मिक रूप से काशी की अलग पहचान है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि जो व्यक्ति यहां प्राण त्यागता है, उसे जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है। यही वजह है कि कई लोग अपने अंतिम पड़ाव में इस शहर का रूख करते हैं। यहां के मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट प्रमुख रूप से अंतिम यात्रा के लिए जाने जाते हैं।
गंगा नदी और इसके 84 घाट
वाराणसी को घाटों का शहर भी कहा जाता है। यहां गंगा नदी का प्रवाह उत्तर की ओर है, जिसे बहुत ही शुभ माना जाता है। गंगा नदी के किनारे 84 घाट बने हुए हैं, जिन्हें आध्यात्मिकता का केंद्र माना जाता है। इन घाटों पर धार्मिक गतिविधियां प्रमुख हैं। साथ ही, यहां की गंगा आरती भी विश्व प्रसिद्ध है।
सभी धर्मों का केंद्र है वाराणसी
वाराणसी सिर्फ हिंदू धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बौद्ध धर्म, जैन धर्म और कई सूफी संतों से भी जुड़ा हुआ है। बौद्ध धर्म में यहां सारनाथ प्रमुख है, जहां भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। वहीं, जैन धर्म के कई तीर्थंकरों का यहां जन्म हुआ था।
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