Asked in UP Police Exam: यूपी के किस जिले को कहा जाता है ‘पूर्व का ग्रास’, जानें यहां
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं। इनमें से एक जिला ऐसा भी है, जिसे ‘पूर्व का ग्रास’ भी कहा जाता है। आपने इस जिले का नाम जरूर सुना होगा। इस लेख में हम जिले के बारे में विस्तार से जानेंगे।
उत्तर प्रदेश देश का चौथा सबसे बड़ा राज्य है, जो कि 240,928 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। भारत का यह राज्य अपनी विविध संस्कृति के लिए जाना जाता है। इस कड़ी में यहां एक जिला ऐसा भी है, जिसे ‘पूर्व का ग्रास’ भी कहा जाता है। खास बात यह है कि यह सवाल 2018 में आयोजित उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल परीक्षा में भी पूछा गया है।
इसके अलावा UPSSSC की Enforcement Constable और Assistant Accountant परीक्षाओं में भी यह सवाल आया है। ऐसे में इस सवाल का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। इस लेख में हम इस बारे में विस्तार से जानेंगे।
किस जिले को कहा जाता है ‘पूर्व का ग्रास’
उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले को ‘पूर्व का ग्रास’ भी कहा जाता है। अंग्रेजी में हम इसे "Grasse of the East" लिखते हैं। कन्नौज को यह अनोखा नाम क्यों मिला है और इसके पीछे का ऐतिहासिक व भौगोलिक कारण क्या है, यह हम नीचे पढ़ेंगे।
क्यों कहा जाता है ‘पूर्व का ग्रास’
कन्नौज को 'पूर्व का ग्रास' कहे जाने के पीछे का कारण फ्रांस का एक प्रसिद्ध शहर है। दरअसल, फ्रांस में एक शहर ग्रास है, जिसे पूरी दुनिया की 'इत्र राजधानी' (Perfume Capital of the World) माना जाता है। यहां वर्षों से प्राकृतिक फूलों से इत्र तैयार किये जाते हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश का कन्नौज भी खुशबू नगरी के रूप में जाना जाता है।
यहां वर्षों से प्राकृतिक रूप से डेग-भपका पद्धति का उपयोग कर इत्र तैयार किये जाते हैं। यही वजह है कि इतिहासकारों और विद्वानों ने कन्नौज को ‘पूर्व का ग्रास’ नाम की उपाधि दी है।
कन्नौज में इत्र का क्या रहा है इतिहास
कन्नौज को प्राचीन भारत में ‘कान्यकुब्ज’ नाम से जाना जाता था। यह 7वीं शताब्दी में हर्षवर्धन की राजधानी रही थी और इसी समय इसे ‘महोदया नगर’ के नाम से भी जाना जाता था। ऐसा माना जाता है कि मुगल काल में यहां इत्र उद्योग को बढ़ावा मिला था, क्योंकि मुगल सम्राज्ञी नूरजहां को गुलाब का इत्र बेहद पसंद था। ऐसे में उनके काल में कन्नौज के कारीगरों ने गुलाब के फूलों से इत्र बनाना शुरू किया और आज यहां विभिन्न प्रकार के इत्र मिलते हैं।
कन्नौज का इत्र ही क्यों खास है?
अब सवाल है कन्नौज का इत्र ही क्यों खास है? दरअसल, यहां प्राकृतिक रूप से इत्र बनाए जाते हैं, जो कि अल्कोहल मुक्त होते हैं, जिसमें किसी भी प्रकार के केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इत्र को बनाने में चंदन के तेल या फिर बेस ऑयल का उपयोग होता है।
वहीं, कन्नौज का सबसे अनोखा आविष्कार 'शमामा' और 'मिट्टी का इत्र' है। गर्मी के बाद जब पहली बारिश की बूंदें मिट्टी पर पड़ती हैं, तो इससे निकलने वाली सौंधी खुशबू को यहां के कारीगर शीशी में कैद कर लेते हैं और इससे इत्र बनाते हैं। यह बहुत पसंद किया जाता है।
इत्र को मिला है GI Tag
कन्नौज के इत्र की खास बात यह है कि यहां के इत्र को GI Tag भी मिला है।इसके अतिरिक्त, उत्तर प्रदेश सरकार की 'एक जिला-एक उत्पाद' (ODOP - One District One Product) योजना के तहत कन्नौज के इत्र उद्योग को वैश्विक स्तर पर बढ़ाने पर सहयोग दिया दिया जा रहा है। मौजूदा समय में यहां 200 से अधिक पारंपरिक भट्टियां चल रही हैं।
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