प्राचीन भारत में कब-कब विदेशी ताकतों ने किया आक्रमण, देखें पूरी लिस्ट
भारत का प्राचीन इतिहास उठाकर देखें, तो उत्तर-पश्चिम सीमा से ही आक्रमणकारियों ने भारत पर आक्रमण किया। इस लेख में हम उन सभी विदेशी ताकतों के बारे में जानेंगे, जिन्होंने भारत पर हमला किया और उनके हमले से भारत पर क्या प्रभाव पड़ा।
भारत का प्राचीन इतिहास उठाकर देखें, तो हमें इसकी उत्तर-पश्चिमी सीमा से कई हमले देखने को मिलते हैं। इस सीमा से प्रवेश कर विदेशी ताकतों ने भारत की संस्कृति, अर्थव्यवस्था, कला और राजनीति पर गहरा प्रभाव छोड़ा। इन आक्रमणकारियों में ईरानी से लेकर हूण तक शामिल हैं। कई प्रतियोगी परीक्षाओं में इनके क्रॉनोलॉजिकल ऑर्डर तक पूछ लिये जाते हैं। हम अपने इस लेख में इन सभी आक्रमणकारियों के बारे में विस्तार से जानेंगे।
कब-कब किसने किया हमला
यहां विदेशी ताकतों के आक्रमण की पूरी लिस्ट दी गई है।
ईरानी आक्रमण-छठी शताब्दी ईसा पूर्व
भारत में सबसे पहला सफल विदेशी हमला ईरान के हखामनी राजवंश के राजाओं ने किया था। इस राजवंश से साइरस ने सबसे पहले उत्तर-पश्चिम सीमावर्ती क्षेत्रों पर पहला हमला किया था। इसके बाद दारा प्रथम द्वारा दूसरा हमला किया गया था। इसने गंधार और कंबोज पर जीत भी हासिल कर ली थी।
क्या रहे प्रभाव
ईरानी हमले के बाद भारत में ‘खरोष्ठी’ और ‘अरामाइक’ लिपि का पहुंची थी। वहीं, भारत में ईरानी वास्तुकला कला का भी उद्गम हुआ था। इसका उदाहरण हमें अशोक के शिलालेखों पर मिलता है, जिसके तहत पत्थरों को चमकाया जाता था।
यूनानी आक्रमण-चौथी शताब्दी ईसा पूर्व
भारत में ईरानियों के बाद यूनानी आक्रमण देखे गए। सबसे पहले 326 ईसा पूर्व में सिकंदर महान द्वारा हिंदुकुश पर्वत को पार कर भारत पर आक्रमण किया गया। इस दौरान तक्षशिला के राजा रहे आम्भी द्वारा बिना लड़े ही आत्मसमर्पण कर दिया गया था। इसके बाद सिकंदर और पंजाब के राजा रहे पोरस के बीच झेलम नदी पर युद्ध हुआ, जिसे हाइडेस्पीज का युद्ध भी कहा जाता है। इस युद्ध में सिकंदर पोरस की बहादुरी से प्रभावित हुआ और पोरस को उसका राज्य वापस कर दिया। इसके बाद ब्यास नदी को पार कर आगे बढ़ने के लिए सिकंदर की सेना ने मना कर दिया था।
क्या पड़ा प्रभाव
इस युद्ध के बाद भारत और पश्चिम के बीच व्यापारिक रास्ते को दिशा मिली। वहीं, भारत में पहुंची गंधार शैली यूनानी प्रभाव का ही परिणाम थी।
इंडो-ग्रीक आक्रमण -दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व
भारत में मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर-मध्य एशिया के यूनानियों ने भारत पर दोबारा आक्रमण कर दिया। इस दौरान डेमेट्रियस प्रथम ने 190 ईसा पूर्व में भारत पर आक्रमण किया और सियालकोट को अपनी राजधानी बनाया। इसके बाद मिलिंद नाम के प्रसिद्ध यूनानी भी भारत पहुंचे, जिन्होंने बौद्ध भिक्षु नागसेन के साथ दार्शनिक संवाद किया, जिसका उल्लेख प्रसिद्ध ग्रंथ 'मिलिंदपञ्हो' में मिलता है।
क्या पड़ा प्रभाव
भारत में सबसे पहले सोने के सिक्के इंडो-ग्रीक द्वारा ही जारी किये गए थे। इनके द्वारा ही सिक्कों पर राजा और चित्रों को उकेरने की शुरुआत की गई थी।
शक आक्रमण-पहली शताब्दी ईसा पूर्व
शक एक खानाबदोश और चरवाहा जनजाति थी, जो कि मध्य एशिया में पाई जाती थी। इन्हें ‘यूची’ कबीले ने उनके मूल स्थान से हटा दिया था। उस समय शकों की भारत में पांच शाखाएं हुआ करती थीं, जिनमें अफगानिस्तान, पंजाब, मथुरा, ऊपरी दक्कन और पश्चिमी भारत शामिल था। रुद्रदामन प्रथम पश्चिमी शाखा का सबसे प्रतापी राजा हुआ करता था, जिसने गुजरात की प्रसिद्ध सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार कराया था।
क्या पड़ा प्रभाव
शकों के आक्रमण के बाद भारत में प्रांतीय शासन की 'क्षत्रप प्रणाली' को मजबूती मिली थी।
पहलव आक्रमण -पहली शताब्दी ईस्वी
शकों के आक्रमण के बाद ईरान के पार्थिया क्षेत्र से 'पहलव' भारत पहुंचे थे। हालांकि, इन्होंने बहुत कम समय के लिए शासन किया। पहलव वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा गोंडोफर्नीस था, जिसके शासनकाल में ईसाई धर्म के प्रचारक सेंट थॉमसपहली बार भारत पहुंचे थे।
कुषाण आक्रमण-पहली शताब्दी ईस्वी
पहलवों के बाद कुषाण भारत पहुंचे थे, जो कि ‘यूची’ कबीले के थे। यह सबसे शक्तिशाली विदेशी राजवंश रहा था। भारत में कुषाण वंश की नींव कुजुल कडफिसेस ने रखी थी। वहीं, राजा कनिष्क भी कुषाण वंश के ही थे, जिन्होंने 78 ईस्वी में ‘शक संवत’ शुरू किया था। आज यह ही भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर है। कनिष्क के काल में ही बौद्ध की चौथी संगीति कुंडलवन में हुई थी और बौद्ध धर्म हीनयान और महायान में बंट गया था। उस समय पेशावर इस राजवंश की मुख्य राजधानी हुआ करती थी।
क्या रहे प्रभाव
कुषाण राजवंश ने रेशम मार्ग पर अपना नियंत्रण कर लिया था, जिससे भारत को समृद्ध होने में मदद मिली।
हूण आक्रमण-पांचवीं शताब्दी ईस्वी
हूणों को मध्य एशिया का क्रूर और बर्बर लुटेरा कहा जाता है, जिन्होंने गुप्त साम्राज्य के दौरान भारत में जमकर लूटपाट मचाई। इस वंश में तोरमाण और मिहिरकुल सबसे क्रूर शासक रहे। आपको बता दें कि मिहिरकुल शिव की अराधना करता था, जबकि बौद्ध धर्म का विरोधी थी। हूणों और गुप्ताओं के बीच काफी युद्ध था, हालांकि बाद में गुप्त साम्राज्य के कमजोर शासकों की वजह से हूणों ने भारत पर बार-बार आक्रमण किया और गुप्त साम्राज्य का पतन हो गया।
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