केंद्र सरकार परिसीमन आयोग के गठन को लेकर लोकसभा में परिसीमन विधेयक, 2026 पेश किया है। इसके तहत पूरे भारत में जनगणना के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन किया जाएगा।
नई जनगणना के आधार पर सीटों का बंटवारा भी होगा, जिससे सीटों की संख्या में बदलाव होगा। हालांकि, इससे दक्षिण भारत राज्यों में नाराजगी है, क्योंकि दक्षिण भारत ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे परिसीमन होने पर दक्षिण भारत की सत्ता में पकड़ धीली हो सकती है। क्या है परिसीमन विधेयक और क्यों है इस पर बवाल, जानने के लिए यह लेख पढ़ें।
क्या है परिसीमन आयोग
केंद्र सरकार बजट सत्र की विशेष बैठक में परिसीमन विधेयक, 2026 को पेश कर परिसीमन आयोग का गठन करेगी। इस विधेयक के तहत सरकार नए जनगणना आंकड़ों के आधार पर लोकसभा और विधानसभा में सीटों का निर्धारण करेगी कि किस क्षेत्र में कितनी सीटें होनी चाहिए।
आयोग में कौन-कौन होगा शामिल
परिसीमन विधेयक, 2026 के मसौदे के मुताबिक, परिसीमन आयोग में अध्यक्ष के रूप में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश होंगे। वहीं, मुख्य निर्वाचन आयुक्त या आयुक्त द्वारा नामित एक निर्वाचन आयुक्त और राज्य चुनाव आयुक्त पदेन सदस्य होंगे।
राज्य से शामिल होंगे 10 सहयोगी सदस्य
परिसीमन विधेयक, 2026 के मुताबिक, आयोग की मदद के लिए संबंधित राज्य से 10 लोगों को जोड़ा जाएगा। इसमें राज्य के 5 लोकसभा सदस्य और 5 विधानसभा सदस्य होंगे। यदि किसी राज्य से 5 से कम लोकसभा सदस्य इसमें शामिल होते हैं, तो पूरे राज्य के सभी लोकसभा सदस्य आयोग का सहयोग करेंगे।
दक्षिण भारत क्यों है नाराज
दक्षिण भारत के राज्य परिसीमन से नाराज हैं। इसके पीछे निम्निलिखित कारण हैंः
1971 परिवार नियोजन को किया लागू
दक्षिण भारत के राज्यों ने 1971 के केंद्र के परिवार नियोजन कार्यक्रम का प्रभावी रूप से लागू किया है, जिससे राज्यों की जनसंख्या में अधिक बढ़ोतरी नहीं हुई है। वहीं, परिसीमन जनसंख्या के आधार पर किया जाएगा, जिसमें उत्तर भारत के राज्य जैसेः यूपी और बिहार की जनसंख्या अधिक निकलेगी, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों की जनसंख्या कम होगी। अभी लोकसभा सीटों का बंटवारा 1971 की जनगणना के तहत है। यदि 2026 की जनगणना के तहत परिसीमन हुआ, तो दक्षिण भारत का लोकसभा में प्रभुत्व कम होगा।
केंद्र सरकार बनाने में कम होगी भूमिका
परिसीमन के बाद दक्षिण भारत के राज्यों की सीटें या तो कम होंगी या फिर स्थिर रहेंगी। यदि ऐसा होता है, तो उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण भारत के राज्य केंद्र सरकार बनाने में कमजोर साबित होंगे। वहीं, दक्षिण भारत के राज्य अधिक विकसित हैं और टैक्स भी अधिक देते हैं। ऐसे में राज्यों को पहले ही लगता है कि हमारा टैक्स उत्तर भारत के पिछड़े राज्यों के विकास पर खर्च किया जाता है। इससे आर्थिक मतभेद भी बनेंगे।
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