भारत की 'पहली रेडियो महिला' के रूप में उषा मेहता (Usha Mehta) को जाना जाता है। उनका नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों के साथ दर्ज है। वह न सिर्फ रेडिया गर्ल नाम से जानी जाती हैं, बल्कि इससे कहीं अधिक वह एक 'स्वतंत्रता सेनानी' के रूप में जानी जाती हैं, जिन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान गुप्त रेडियो का संचालन कर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला कर रख दी थी। इस लेख में हम उनके बारे में विस्तार से जानेंगे।
ऊषा मेहता का प्रारंभिक जीवन
ऊषा मेहता का जन्म 25 मार्च 1920 को गुजरात के सूरत के पास एक गांव में हुआ था। वह जब सिर्फ 8 साल की थी, तब उन्होंने साइमन कमीशन के खिलाफ हुए प्रदर्शन में भाग लिया था।
सीक्रेट कांग्रेस रेडियो' की स्थापना की
साल 1942 में महात्मा गांधी ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' की घोषणा की थी। इस दौरान ब्रिटिश सरकार ने सभी बड़े नेताओं की गिरफ्तारी की थी। साथ ही, भारतीय प्रेस पर कड़ी पाबंदी भी लग गई थी। इस बीच उषा मेहता ने सूचना प्रसार के लिए गुप्त रेडिया का रास्ता चुना। उन्होंने 14 अगस्त, 1942 को अपने सहयोगियों का साथ लिया और सीक्रेट कांग्रेस रेडिया की स्थापना की। उन्होंने रेडिया पर पहली बार यह कहा था- "यह भारत में कहीं से कांग्रेस रेडियो है।"
गुप्त स्थान पर चलाया रेडियो
उस समय अंग्रेज भारतीयों की हर हरकत पर ध्यान रख रहे थे। ऐसे में अंग्रेजों से बचने के लिए मेहता व उनके साथी रेडियो का ट्रांसमीटर व अपना स्थान बदल लेते थे, जिससे उन्हें अंग्रेज न पकड़ सके। वे रेडियो के माध्यम से महात्मा गांधी के संदेश, आंदोलनों की जानकारी और प्रतिबंधित खबरों को प्रसारित करते थे। इस काम में नरीमन प्रिंटर जैसे इंजीनियर्स ने उनके समूह की मदद की थी।
नवंबर, 1942 में हुई गिरफ्तारी
अंग्रेजी पुलिस ने कई महीनों तक कड़ी मशक्कत की और नवंबर, 1942 में ऊषा मेहता को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने उन पर मुकदमा चलाया और उन्हें 4 साल की सजा हुई। हालांकि, इस दौरान भी मेहता ने किसी भी प्रकार की कोई गुप्त जानकारी ब्रिटिश को नहीं दी।
1998 में मिला पद्म विभूषण पुरस्कार
देश आजाद होने के बाद उन्होंने पी.एच.डी की डिग्री प्राप्त की और मुंबई विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन गईं। वहीं, साल 1998 में भारत सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को देखते हुए भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया।