मिडिल ईस्ट जंग के चलते आज कल ईरान काफी सुर्ख़ियों में बना हुआ है, इसी कड़ी में आज हम यहां ईरान की संसदीय व्यवस्था के बारें में चर्चा करने जा रहे है. ईरान की संसद को आधिकारिक तौर पर Islamic Consultative Assembly कहा जाता है, जिसे फारसी में मजलिस-ए-शूरा-ए-इस्लामी (Majles-e Shura-ye Eslami) कहा जाता है। यह देश की एकसदनीय (unicameral) विधायिका है, जो कानून बनाने और शासन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने का काम करती है।
क्या है इसका इतिहास
इस संसद की जड़ें 1905-1911 की पर्शियन संवैधानिक क्रांति से जुड़ी हैं, जब पहली बार मजलिस (Majles) की स्थापना हुई। Iranian Revolution के बाद 1979 में इसका नाम बदलकर इस्लामिक कंसल्टेटिव असेंबली कर दिया गया, ताकि इसे नए इस्लामी संविधान के अनुरूप बनाया जा सके।
कैसे होता है गठन और चुनाव
संसद में कुल 290 सदस्य होते हैं, जिन्हें हर चार साल में सीधे चुनाव के जरिए चुना जाता है। ये सदस्य एकल निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। संसद की बैठकें तेहरान के बहारिस्तान परिसर में होती हैं और यह देश की मुख्य विधायी संस्था के रूप में कार्य करती है।
क्या है शक्तियां और कार्य
मजलिस का मुख्य काम कानून बनाना, उनकी व्याख्या करना और सरकार की निगरानी करना है। यह मंत्रियों और राष्ट्रपति को तलब कर सकती है या महाभियोग भी चला सकती है। हालांकि, सभी कानूनों की समीक्षा Guardian Council द्वारा की जाती है, ताकि वे संविधान और इस्लामी सिद्धांतों के अनुरूप हों।
ईरान की राजनीति में क्या है रोल
ईरान की शासन व्यवस्था में मजलिस एक अहम स्तंभ है, लेकिन यह Supreme Leader के अधीन काम करती है। इसके साथ गार्जियन काउंसिल और एक्सपीडिएंसी काउंसिल भी अहम भूमिका निभाते हैं। 1979 के बाद सीनेट को खत्म कर एकसदनीय व्यवस्था लागू की गई और 1989 के संवैधानिक संशोधन में इसे औपचारिक रूप से नया नाम दिया गया।
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