टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा उद्धृत 2021-22 के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ सालों में भारत की शिक्षा प्रणाली में बदलाव देखने को मिला है। साथ ही, लैंगिक समानता में भी एक बड़ा बदलाव आया है। हालिया आंकड़ों और रिपोर्टों के अनुसार, प्राइमरी स्कूल से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) तक अब छात्राओं (लड़कियों) की संख्या छात्रों (लड़कों) से अधिक हो गई है। जेंडर गैप (Gender Gap) के इस तरह उलटने से साफ है कि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का संकल्प अब धरातल पर सच हो रहा है।
लैंगिक समानता सूचकांक (GPI ), जो पुरुषों की तुलना में महिलाओं के नामांकन का माप है, कई स्तरों पर 1.0 को पार कर गया है, जो महिलाओं की उच्च भागीदारी को दर्शाता है। उच्च शिक्षा में समग्र रूप से, GPI लगभग 1.01 रहा, जो महिलाओं की मामूली लेकिन महत्वपूर्ण बढ़त को दर्शाता है।
स्कूल से पीजी तक: हर स्तर पर बेटियों का दबदबा
एक समय था जब उच्च शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी बहुत कम थी, लेकिन आज स्थिति बिल्कुल अलग और उलटी हो गई है। सरकारी रिपोर्टों (जैसे AISHE) के अनुसार, न केवल स्कूल नामांकन बल्कि कॉलेज और यूनिवर्सिटी में भी लड़कियां लड़कों को पीछे छोड़ रही हैं।
शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर नामांकन की स्थिति देखें
| शिक्षा का स्तर | ट्रेंड | मुख्य कारण |
| प्राइमरी स्कूल | लड़कियां > लड़के | सरकारी छात्रवृत्ति और मुफ्त शिक्षा |
| सेकेंडरी स्कूल | लड़कियां > लड़के | स्कूलों में बेहतर सुविधाएं (शौचालय आदि) |
| ग्रेजुएशन (UG) | लड़कियां > लड़के | करियर के प्रति बढ़ती जागरूकता |
| पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) | लड़कियां > लड़के | विशेषज्ञता और रिसर्च में रुचि |
हायर एजुकेशन में महिलाओं की सशक्त उपस्थिति, MPhil
स्नातकोत्तर स्तर पर, GPI बढ़कर लगभग 1.11 हो गया, जो महिला छात्रों के स्पष्ट प्रभुत्व को दर्शाता है। MPhil पाठ्यक्रमों में यह प्रवृत्ति और भी अधिक स्पष्ट है, जहां GPI लगभग 1.33 तक पहुंच गया, जो पुरुषों की तुलना में महिलाओं के काफी अधिक नामांकन को इंगित करता है।
हालांकि, Phd स्तर पर, अंतर थोड़ा कम हो जाता है, जिसमें GPI लगभग 0.98 पर समता से थोड़ा नीचे रहता है, जो लगभग समान भागीदारी का सुझाव देता है।
क्यों उलट गया जेंडर गैप? सफलता के 4 बड़े कारण
शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की इस बढ़ती भागीदारी के पीछे कई सामाजिक और सरकारी कारक जिम्मेदार हैं:
1. सरकारी योजनाएं और प्रोत्साहन
साइकिल वितरण, मुफ्त यूनिफॉर्म , किताबें और 'सुकन्या समृद्धि योजना' जैसी पहलों ने गांब क्षेत्रों में भी माता-पिता को अपनी बेटियों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया है।
2. बेहतर बुनियादी ढांचा
स्कूलों और कॉलेजों में लड़कियों के लिए अलग शौचालयों का निर्माण और बेहतर सुरक्षा व्यवस्था ने ड्रॉप-आउट दर (बीच में पढ़ाई छोड़ना) को काफी कम कर दिया है।
3. सोच में बदलाव
अब भारतीय परिवार बेटियों को 'पराय धन' मानने के बजाय उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने पर जोर दे रहे हैं।
4. करियर के नए अवसर
टीचर और नर्सिंग के अलावा अब बेटियां खुद इंजीनियरिंग, डेटा साइंस, लॉ और मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं।
हायर एजुकेशन में लड़कियों का बढ़ता ग्राफ
ताजा आंकड़ों के अनुसार, हायर एजुकेशन (Higher Education) में लड़कियों के नामांकन में 32% तक की वृद्धि देखने को मिली। सबसे दिलचस्प बात यह है कि प्रोफेशनल कोर्सेज में भी अब जेंडर गैप खत्म हो रहा है।
आज भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहां STEM (विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित) शिक्षा में स्नातक करने वाली महिलाओं का प्रतिशत पश्चिमी देशों से भी अधिक है।
चुनौतियां और आगे की राह
हालांकि नामांकन के मामले में लड़कियां आगे निकल गई हैं, लेकिन अभी भी वर्कफोर्स यानी नौकरियों में उनकी भागीदारी को बढ़ाने की चुनौती बनी हुई है। पढ़ाई पूरी करने के बाद लड़कियों को करियर के समान अवसर मिले, यह अगला बड़ा लक्ष्य होना चाहिए।
बेटियों की यह शैक्षणिक सफलता केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि एक नए और सशक्त भारत की तस्वीर है। जब एक बेटी पढ़ती है, तो वह केवल अपना भविष्य नहीं बल्कि पूरे समाज का भविष्य संवारती है।
भारत के लिए भी आगे की राह
शिक्षा में लड़कियों की बढ़ती भागीदारी भारतीय समाज में एक संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। नामांकन संख्या उत्साहजनक है, लेकिन विशेषज्ञ रोजगार और नेतृत्व की भूमिकाओं में समान अवसर सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल देते हैं। यह प्रवृत्ति आने वाले सालों में भारत के कार्यबल और सामाजिक-आर्थिक भविष्य को महत्वपूर्ण रूप से बदल सकती है।
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