मजिस्ट्रेट और सिविल जज में क्या होता है अंतर? बेहतर तरीके से समझें यहां

Feb 9, 2026, 18:04 IST

मजिस्ट्रेट और सिविल जज के अधिकार क्षेत्र और कार्य को लेकर अक्सर लोगों में भ्रम की स्थिति बनी रहती है, दोनों की नियुक्ति राज्य लोक सेवा आयोग की Judicial Services परीक्षा से होती है, इसी कारण लोगों को लगता है कि दोनों का कार्य क्षेत्र एक जैसा ही हैं।

मजिस्ट्रेट और सिविल जज के कार्यों और अधिकार क्षेत्र को लेकर अक्सर लोगों में भ्रम बना रहता है और कई बार दोनों को एक ही पद समझ लिया जाता है, जबकि वास्तव में इनके काम काफी अलग होते हैं। दोनों की नियुक्ति राज्य लोक सेवा आयोग की Judicial Services परीक्षा से होती है, इसी कारण लोगों को लगता है कि दोनों का कार्य क्षेत्र एक जैसा ही हैं। लेकिन व्यवहार में इनके अधिकार, जिम्मेदारियाँ और कार्यक्षेत्र पूरी तरह अलग होते हैं, चलिए यहां इसके बारें में विस्तार से समझते है। 

कैसे होती है इनकी नियुक्ति 

दोनों पदों पर नियुक्ति राज्य लोक सेवा आयोग की Judicial Services परीक्षा से होती है। उम्मीदवार के पास कानून की डिग्री होना जरूरी है। Civil Judge की सीधी भर्ती सिविल कैडर में होती है, जबकि Magistrate न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में आपराधिक कैडर में कार्य करता है। नियुक्ति राज्य सरकार हाईकोर्ट की सलाह से करती है और प्रमोशन सेवा रिकॉर्ड पर निर्भर करता है।

कौन किस मामले में करता है सुनवाई:

सिविल जज का अधिकार क्षेत्र दीवानी मामलों तक सीमित होता है और केस की कीमत (Pecuniary Limit) के अनुसार Junior या Senior Division में बांटा जाता है। दूसरी ओर Magistrate आपराधिक क्षेत्राधिकार में काम करते हैं और BNSS (पूर्व CrPC) के तहत समन, वारंट और समरी ट्रायल चलाते हैं। Chief Judicial Magistrate अधिकतम 7 साल तक की सजा वाले मामलों की सुनवाई कर सकते हैं। 

मजिस्ट्रेट और सिविल जज में अंतर:

भारत की न्यायिक व्यवस्था में सिविल जज और मजिस्ट्रेट की भूमिकाएँ अलग-अलग होती हैं। सिविल जज (Civil Judge) मुख्य रूप से दीवानी मामलों जैसे संपत्ति विवाद, अनुबंध, पारिवारिक झगड़े, तलाक, वसूली आदि की सुनवाई करते हैं। वहीं मजिस्ट्रेट (Magistrate) आपराधिक मामलों को देखते हैं, जैसे चोरी, मारपीट, शांति भंग, सार्वजनिक उपद्रव आदि। सरल शब्दों में, सिविल जज नागरिक विवाद सुलझाते हैं और मजिस्ट्रेट अपराधों पर फैसला करते हैं।

पहलू 

सिविल जज (Civil Judge)

मजिस्ट्रेट (Magistrate)

केस का प्रकार

दीवानी मामले (जैसे मुकदमे, निषेधाज्ञा, संपत्ति विवाद)

आपराधिक मामले (जैसे छोटे अपराध, चोरी, मारपीट)

सजा देने की शक्ति

आर्थिक दंड, हर्जाना या आदेश, जेल की सजा नहीं

अधिकतम 7 साल तक की जेल (CJM)

वेतन सीमा

लगभग ₹77,840-₹1,36,520 (जूनियर डिवीजन)

लगभग समान (JMFC के लिए)

प्रमुख कानून

सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC)

BNSS - भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (पूर्व CrPC)

कैसी निर्धारित होती है इनकी रैंकिंग:

सिविल जज जिला न्यायपालिका में Junior और Senior Division में होते हैं, जिनके फैसलों के खिलाफ अपील जिला अदालत में जाती है। मजिस्ट्रेट में Judicial मजिस्ट्रेट 1st क्लास, 2nd क्लास, Chief Judicial मजिस्ट्रेट और Metropolitan मजिस्ट्रेट शामिल होते हैं। इनके आदेशों पर अपील सत्र न्यायालय (Sessions Court) में की जाती है। 

किसके पास होता है गिरफ्तारी का आदेश?

सिविल जज हर्जाना, स्थायी निषेधाज्ञा, संपत्ति अधिकार और अनुबंध पालन जैसे आदेश देते हैं, लेकिन किसी को जेल भेजने की शक्ति नहीं होती। वहीं मजिस्ट्रेट गिरफ्तारी का आदेश, जमानत, पूछताछ और ट्रायल कर सकते हैं। वे आपराधिक न्याय प्रणाली के पहले स्तर के अधिकारी होते हैं और कानून व्यवस्था बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।

किसका होता है नियंत्रण:  

दोनों के लिए कानून की डिग्री और कुछ राज्यों में अनुभव जरूरी होता है। चयन Judicial Services Exam से होता है। Civil Judge आगे चलकर जिला जज (District Judge) बन सकते हैं, जबकि मजिस्ट्रेट पदोन्नति पाकर Sessions Judge बनते हैं। दोनों ही हाईकोर्ट के नियंत्रण में स्वतंत्र रूप से न्यायिक कार्य करते हैं। 

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Bagesh Yadav
Bagesh Yadav

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