भारत में यदि झंडों के शहर की बात करें, तो यह कर्नाटक का मैसूर शहर है। यह शहर एक तरफ अपने यहां के आलीशान महलों के लिए जाना जाता है, तो दूसरी तरफ इसकी पहचान में झंडा भी जुड़ा है। इस पहचान ने इसे देशभर में एक नया नाम भी दिया है, जिससे इसे ‘झंडों के शहर’ के रूप में भी जानते हैं। यहां भारत का सबसे बड़ा खादी सिल्क और झंडा निर्माण क्षेत्र है।
क्यों कहा जाता है झंडों का शहर
मैसूर में खादी ग्रामोद्योग है, जो कि शुद्ध खादी का कपड़ा तैयार करती है। यह भारतीय मानक ब्यूरो के पैमाने पर खरा उतरता है। वहीं, भारत के राष्ट्रीय ध्वज के लिए जिस विशेष प्रकार की बुनाई और कपड़े की आवश्यकता होती है, उसका एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है।
शाही परंपरा और दशहरा उत्सव से पहचान
मैसूर अपने यहां मनाए जाने वाले दशहरा उत्सव के लिए भी जाना जाता है। इस दौरान यहां शहर को हजारों झंडों से पाट दिया जाता है। वहीं, मैसूर पैलेस से निकलने वाली शाही सवारी में भारत के विभिन्न प्रतिकात्मक झंडे प्रदर्शित किए जाते हैं। इसमें कभी मैसूर साम्राज्य के रहे अपने झंडे भी शामिल होते हैं।
झंडा सत्याग्रह के लिए प्रसिद्ध
आपको बतादें कि आजादी के लड़ाई में कर्नाटक का यह हिस्सा राष्ट्रवाद का केंद्र हुआ करता था। उस समय मैसूर के लोगों ने 'झंडा सत्याग्रह' में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। यहां के लोगों ने ब्रिटिश के खिलाफ जगह-जगह तिरंगा फहराया था, जिससे इस शहर को झंडे के शहर के रूप में भी पहचान मिल गई थी।
झंडा निर्माण में मैसूर कारीगरों की मांग
भारत में 2022 के संशोधन से पहले तिरंगे का निर्माण केवल खादी में ही होना अनिवार्य था। ऐसे में भारतीय मानक ब्यूरो के मानकों के मुताबिक, तिरंगे के लिए इस्तेमाल होने वाली खादी की ‘थ्रेड काउंट’ और ‘टेंसाइल स्ट्रेंथ’ बहुत विशेष होती है।
इस कला को मैसूर के कलाकार ही जानते थे। इस वजह से यहां राष्ट्रीय ध्वज का निर्माण किया जाता था। वर्तमान में हुबली स्थित 'कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ' भारत की एकमात्र ऐसी इकाई है, जिसे भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा तिरंगा झंडा बनाने और सप्लाई करने का लाइसेंस प्राप्त है।