भारतीय रेलवे दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेलवे नेटवर्क है। वहीं, एशिया में यह दूसरे पायदान पर है। रेलवे नेटवर्क की बात करें, तो यह 67 हजार किलोमीटर से अधिक है। वहीं, यदि साइडिंग और यार्ड के ट्रैक की गणना की जाए, तो इसकी कुल लंबाई 1 लाख किलोमीटर से अधिक है। रेलवे में प्रतिदिन 13 हजार से अधिक पैसेंजर ट्रेनों का संचालन होता है, जो कि 7 हजार से अधिक स्टेशनों से करोड़ों यात्रियों के साथ गुजरती हैं।
वहीं, माल ढुलाई में भी रेलवे अव्वल है। यही वजह है कि रेलवे को देश की आर्थिक रीढ़ भी कहा जाता है। यात्रियों की सुविधाओं के हिसाब से रेलवे द्वारा अलग-अलग एक्सप्रेस ट्रेनों का संचालन किया जाता है। आपने भारतीय रेलवे की अलग-अलग एक्सप्रेस ट्रेनों के बारे में पढ़ा और सुना होगा।
हालांकि, क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ट्रेन ऐसी भी है, जिसे ‘लाइफलाइन एक्सप्रेस’ कहा जाता है। यह ट्रेन बीते 34 वर्षों से अपने साथ चलता-फिरता अस्पताल लेकर पटरियों पर दौड़ रही है। खास बात यह है कि इसमें मुफ्त में इलाज होता है, लेकिन अधिकांश लोगों को इस ट्रेन के बारे में जानकारी नहीं है।
क्या है लाइफलाइन एक्स्प्रेस
‘Lifeline Express’ को ‘Hospital on wheels’ भी कहा जाता है। इस ट्रेन में पूरी तरह से सुसज्जित एक अस्पताल है, जिसमें सर्जरी से लेकर एक्सरे व अन्य सुविधाएं शामिल की गई हैं। खास बात यह है कि इस ट्रेन में इलाज के लिए मरीजों को किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं देना होता है।
34 वर्षों से सेवा में है लाइफलाइन एक्सप्रेस
लाइफलाइन एक्सप्रेस की शुरुआत जुलाई, 1991 में भारतीय रेलवे और एक एनजीओ द्वारा की गई थी। इसका प्रमुख उद्देश्य देश के उन दूर-दराज गांव और कस्बों में इलाज की सुविधा पहुंचाना है, जहां बड़े अस्पताल मौजूद नहीं हैं। वहीं, दिव्यांगों के लिए भी यह ट्रेन उपयोगी है, जो कि अस्पातल न पहुंचकर इस ट्रेन तक पहुंच सकते हैं।
ट्रेन में क्या-क्या सुविधाएं शामिल हैं
यह ट्रेन एक 7 कोच वाली ट्रेन है, जिसमें 2 ऑपरेशन थियेटर, कैंसर यूनिट, रिकवरी वॉर्ड, पैथोलॉजी लैब, डेंटल क्लीनिक और एक्स-रे की सुविधा है। साथ ही, ट्रेन में डॉक्टरों और नर्स के लिए आवास व किचन की सुविधाएं भी दी गई हैं।
कैसे काम करती है लाइफलाइन एक्सप्रेस
लाइफलाइन एक्सप्रेस जिस गांव और कस्बे में पहुंचती है, वहां 10 से 15 दिन पहले ही ट्रेन के बारे में प्रचार किया जाता है। इससे स्थानीय लोगों को ट्रेन की जानकारी हो जाती है। स्टेशन पर पहुंचने पर यह ट्रेन 20 से 25 दिनों तक एक ही गंतव्य पर ठहरती है। इस दौरान स्थानीय मरीजों की स्क्रीनिंग करने के साथ उनका फॉलोअप भी लिया जाता है। आज भी यह ट्रेन भारत में संचालित है और दुर्गम क्षेत्रों को कवर करती है।
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