महात्मा गांधी से जुड़ा सबसे बड़ा आंदोलन कौन-सा था, जानें यहां
महात्मा गांधी ने हमारे देश की आजादी की कड़ी में कई बड़े आंदोलन चलाए थे। इस कड़ी में एक आंदोलन ऐसा भी चला, जो कि सबसे बड़े आंदोलनों में गिना जाता है। इस लेख में हम इस आंदोलन के बारे में विस्तार से जानेंगे।
महात्मा गांधी ने देश की आजादी के लिए कई बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया। इन आंदोलनों के माध्यम से न सिर्फ उन्होंने भारतीयों के हौंसलों को मजबूत किया, बल्कि बेबाकी से अंग्रेजों के सामने देश की हक की आवाज उठाई। उनके नेतृत्व में कई बड़े आंदोलन हुए, हालांकि क्या आप जानते हैं कि उनके नेतृत्व में कौन-सा आंदोलन सबसे बड़ा था, यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इसे बारे में जानेंगे।
गांधी जी का सबसे बड़ा आंदोलन
महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए गए आंदोलनों में भारत छोड़ो आंदोलनको सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली आंदोलन माना जाता है। असहयोग आंदोलन (1920) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) भी जनभागीदारी के लिहाज से बहुत बड़े थे, लेकिन देश की आजादी की दिशा में आखिर और सबसे निर्णायक प्रहार 'भारत छोड़ो आंदोलन' ही साबित हुआ।
कब और कैसे हुई शुरुआत
8 अगस्त 1942 को बॉम्बे (अब मुंबई) के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक मैदान में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सत्र में इस आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया गया। इसी मैदान से महात्मा गांधी ने देशवासियों को ‘करो या मरो’ का ऐतिहासिक मंत्र दिया था। उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि अब पूर्ण स्वराज्य से कम कुछ भी मंजूर नहीं होगा।
आंदोलन में उमड़ा जनसैलाब
आंदोलन की घोषणा होते ही 9 अगस्त की सुबह ब्रिटिश सरकार ने 'ऑपरेशन जीरो आवर' चलाकर गांधी जी, नेहरू, पटेल सहित कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया था। बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद यह आंदोलन रुका नहीं, बल्कि पूरे देश में फैल गया। अरुणा आसफ अली, राम मनोहर लोहिया और उषा मेहता जैसे युवा नेताओं ने अंडरग्राउंड होकर इसका नेतृत्व किया था।
देशभर में बनीं समानांतर सरकारें
उत्तर प्रदेश के बलिया, बंगाल के तामलुक और महाराष्ट्र के सतारा में जनता ने ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंककर अपनी स्वतंत्र समानांतर सरकारें स्थापित कर ली थीं।
यह सबसे बड़ा आंदोलन क्यों था?
-इससे पहले के आंदोलनों में स्वराज या मांगों की पूर्ति की बात थी, लेकिन 1942 में सीधी मांग केवल एक थी-’अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’।
-दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुए इस विद्रोह ने ब्रिटिश सरकार को यह अहसास करा दिया था कि अब भारतीय जनता पर लंबे समय तक शासन करना नामुमकिन है।
-किसान, मजदूर, छात्र, सरकारी कर्मचारी और यहां तक कि सेना व पुलिस के भारतीय सिपाहियों ने भी इस जन-आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया था।
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